अध्याय 398

वायलेट

क़ायलन की आँखों में जो नज़र थी… उससे साफ़ पता चल रहा था कि उसने जो भी कहा, हर शब्द वो दिल से कह रहा था।

मैं बहस करना चाहती थी, उसे कहना चाहती थी कि वो ग़लत है। कि उसे ऐसे बातें कहने का हक़ नहीं, कम से कम अब तो नहीं। लेकिन मेरा गला अभी भी जकड़ा हुआ था।

और जब आख़िरकार फिर से साँस लेना आसान...

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