अध्याय 489

वायलेट

सपना उस रात आया ही नहीं…

“फिर से!”

मेरे अंदर ग़ुस्सा लहराकर उठा और मैंने पूरी ताक़त से एड़ी पंचिंग बैग में दे मारी। वही खयाल सिर में बार-बार गूंज रहा था। पूरे दो महीनों में पहली बार कोई बुरा सपना नहीं आया था। न कोई पर्दा, न कोई गुफा, न वे लाल आँखें…कुछ भी नहीं।

इतनी सारी रातों में स...

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