अध्याय 165

दूरदराज़ के एक पहाड़ी गाँव में भोर हो रही थी।

सुबह की पहली किरणें पहाड़ी की कगार को लाँघती हुईं आईं और सोए हुए गाँव को जगा गईं।

सोफ़ी की नींद मुर्गों की लगातार तेज़ बाँगों से खुली। उसने आँखें खोलीं—कठोर लकड़ी की खाट ने उसकी पीठ में दर्द बसा दिया था। उसका शरीर अभी तक इन रूखे हालातों का आदी नहीं हुआ...

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