अध्याय 214

रात के सन्नाटे में मेबाख ऊँची रिंग रोड पर सरकती चली जा रही थी।

दोनों तरफ़ लगी स्ट्रीट लाइटें पीछे छूटती जातीं, और कार की खिड़की पर फीकी पीली रोशनी की धारियाँ खींचती चली जातीं।

कार के भीतर का माहौल घुटन भरा था। सोफ़ी ने सिर ठंडी खिड़की से टिका दिया; शीशे में उसका बेरंग-सा चेहरा झलक रहा था।

सच जानक...

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