अध्याय 216

समुद्र की हवा में मछली-सी गंध और तीखी नमकीन नमी घुली थी। उसमें जंग और सड़ती बहकर आई लकड़ी की बदबू मिली हुई थी, जो बेरहमी से उसकी नाक में घुसती चली जा रही थी।

घाट के आख़िरी सिरे पर काली लहरें बार-बार कंक्रीट के खंभों से ज़ोर से टकरा रही थीं, और भारी, गूँजती हुई गरज जैसी आवाज़ें पैदा कर रही थीं।

ओलि...

लॉगिन करें और पढ़ना जारी रखें