अध्याय 296

"यहीं रुक जाओ!"

सोफ़ी ने बेंजामिन को पकड़ा और उसे वापस सोफ़े पर धकेल दिया।

सोफ़ी की ठंडी उँगलियों का स्पर्श होते ही बेंजामिन के भीतर फूटने को तैयार ग़ुस्सा थोड़ा ढीला पड़ गया।

वह मुड़कर उसे देखने लगा, लेकिन उसकी आँखों का अँधेरा कम नहीं हुआ था।

"इतना आसान नहीं है।" सोफ़ी की साँसें अब संभल चुकी थी...

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