अध्याय 54

सोफ़ी की नज़र मेज़ पर रखे मोटे, भूरे मनीला लिफ़ाफ़े पर टिक गई। उसकी साँस गले में अटक गई।

उसका काँपता हाथ आगे बढ़ा।

जैसे ही उसकी उँगलियों ने उस खुरदरे कागज़ को छुआ, पिछले पाँच सालों का बोझ पल भर में उसके दिल पर आ बैठा।

“ये क्या है?” उसने धीमे से पूछा।

“याद है न, तुम हमेशा जानना चाहती थीं कि बेंजा...

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