अध्याय 61

बेंजामिन सोफी के फीके पड़े चेहरे को घूरता रहा, फिर अचानक उसके मुँह से एक ठंडी, उपहास भरी हँसी निकल गई। “इससे कोई लेना-देना नहीं?”

वह आक्रामक ढंग से एक कदम आगे बढ़ा। उसकी लंबी उँगलियाँ फिर से दस्तावेज़ पर जा दबीं—इतनी ताक़त से कि कागज़ लगभग फट ही जाता।

“सोफी, कहीं तुम खुद को ज़्यादा तो नहीं समझ रही...

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