अध्याय 97

ओलिविया का चेहरा मुर्दों की तरह सफ़ेद पड़ गया था—मानो रंग ही निचुड़ गया हो।

सोफ़ी की निगाहें उस पर आग की तरह धँसी हुई थीं—इतनी तीखी कि उसे चीर डालें। ओलिविया का शरीर बेकाबू काँप रहा था; उसके होंठों से एक आवाज़ तक नहीं निकली।

इस बार बेंजामिन ने भी कोई बचाव नहीं किया।

ओलिविया को एक तरफ़ झटककर वह और...

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