अध्याय 65 लास्ट नाइट्स मैन वाज़ क्लिफ्टन

अगली सुबह।

भारी परदों की दरारों से छनकर आती धूप ने आलीशान कालीन पर रोशनी की एक चुभती हुई लकीर खींच दी थी।

मिरांडा की आँख तेज़ प्यास से खुली। उसका गला जैसे आग बना हुआ था—बुरी तरह सूखा, जलता हुआ। वह आदतन हिली, सहारा लेकर उठना चाहती थी कि बिस्तर से उतरकर पानी ढूँढ़ ले। लेकिन तभी पिछली रात के टूटे-फूट...

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