अध्याय 302

"ऐसे दिन में कौन बाहर निकलेगा?" औरत बड़बड़ाई और दरवाज़े की ओर बढ़ गई।

बाहर दो लोग खड़े थे। आगे वाली औरत इतनी ख़ूबसूरत थी कि उसके सामने आस-पास सब कुछ फीका पड़ता लग रहा था। उसने अपनापन भरी मुस्कान के साथ कहा, "बारिश तो ज़ोरों से बरस रही है। अगर बुरा न मानें, तो हम अंदर आकर थोड़ा सूख लें?"

मेहमान की ...

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