अध्याय 336

रात की रंगरेलियाँ अब खत्म हो चुकी थीं।

दावत के कई अहम लोग पहले ही खिसक चुके थे, तो बाकी लोगों के रुकने की भी कोई खास वजह नहीं बची थी।

हर किसी ने चुपचाप निकलने का कोई-न-कोई बहाना बना लिया; बिना बोले ही सब एक-दूसरे की बात समझ रहे थे।

लोग छोटी-छोटी टोलियों में बाहर जाने लगे। किसी ने जान-बूझकर ठोकर ख...

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