अध्याय 204

शायद यही उसका दुःस्वप्न था।

नमी भरी हवा में जंग और फफूँदी की सड़ांध रची-बसी थी। हड्डियाँ जमा देने वाली ठंड में दीवारों से पानी की बूँदें रिस-रिसकर नीचे टपक रही थीं।

वह ज़मीन पर माल-सामान की तरह बँधी पड़ी थी—कलाइयाँ और टखने रगड़-रगड़कर छिल गए थे, खून रिस रहा था। उसका गला सूखकर बैठ गया था, वह शून्य ...

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